भारतीय रेलवे में आजकल टिकट संरक्षित करना कितना मुश्किल हो चुका है, इससे तो हम सब वाकिफ हैं. भले ही आप तीन महीने पहले टिकट खरीदें , दलालों के चलते वो तब भी पक्का नहीं होता. आप इस तरह बीच में झूलते हैं, ना टिकट रद्द करते बनती है और ना नई टिकट खरीदते. देखते देखते सफ़र का दिन आ जाता है और ट्रेन छूटने से दो घंटे पहले आप अपनी टिकट या तो प्रतीक्षा-सूची की कतार में पाते हैं या फिर पक्का हो जाने की ख़ुशी में फूले ना समाते हैं.
कुछ ऐसा ही हाल था पुणे के एक इन्जिनीयरिंग के छात्र प्रफुल की. टिकट तालिका की प्रतीक्षा में पिछले एक घंटे से वो स्टेशन के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रातः भ्रमण कर रहा था. आने से पहले इन्टरनेट पर उसने अपनी टिकट की स्थिति जाँच ली थी. वह प्रतीक्षा-सूची के २ नंबर पर थी. उसे आशा थी कि ट्रेन के छूटने से पहले तक टिकट पक्की हो जाएगी. पुणे से कलकत्ता दो रात की यात्रा है. अगर टिकट पक्का नहीं होता है तो दो रात किस तरह काटने होंगे की कल्पना मात्र से उसके चलने की गति और बढ़ जाती. अंत में वह वक्त आ ही गया, और तालिका के टंगते ही भीड़ उमड़ पड़ी. किसी तरह उसने देख ही लिया कि उसकी टिकट पक्की हो गई है. दिमाग से एक भारी बोझ सा उतर गया. तभी उसकी नज़र उसके पास खड़ी लगभग उसी के उम्र की एक लड़की पर पड़ी जिसका चेहरा उतरा हुआ-सा था और आँखें लाल हो आई थीं. इतने में ट्रेन भी लग गई और चारों तरफ एक भगदड़ सी मच गई. प्रफुल को कुछ खास जल्दी तो थी नहीं. आखिर टिकट जो पक्का था. इत्मीनान से जब वो अपनी बर्थ पर गया तो उसी लड़की को डरी-सहमी सी वहीँ बैठे पाया. प्रफुल का बर्थ ऊपर था. उसे लगा नीचे वाला बर्थ लड़की का होगा. उसने अपना सामान सीट के नीचे लगा दिया और बैठ गया. ट्रेन चल पड़ी.
प्रफुल लगभग ६ महीने बाद अपने घर कलकत्ता जा रहा था. भाई-बहन, माँ-पापा से मिलने को उसका दिल बड़ा आतुर था. पर सबसे ज्यादा ख़ुशी उसे इस बात की हो रही थी कि उसके बगल में एक लड़की बैठी है. हर बार किसी भी तरह की यात्रा से पहले वो ईश्वर से प्रार्थना करता कि कोई अच्छी सी लड़की उसके साथ सफ़र करें, ताकि उससे बातें हों और सफ़र मजे से कटे. पर इसबार टिकट की चिंता में, प्रार्थना के बारे में वह भूल ही गया था. इसलिए वह मन ही मन भगवान् का शुक्रिया अदा करते नहीं थक रहा था कि बिन मांगे ही उसने उसकी सुन ली. दरअसल प्रफुल बड़ा ही अच्छा लड़का था. उसने कभी भी किसी लड़की को बुरी नज़र से नहीं देखा. कालेज में सब उसे 'बच्चा' कहकर चिढ़ाते थे. मन ही मन वह चाहता था कि उसकी भी कोई गर्लफ्रेंड हो, पर एक तो उसकी हिम्मत नहीं होती किसी भी लड़की से पहल करने की, और दूसरी, सब लड़कियां उसे अपने भाई जैसा मानती थीं. बेचारे के मन की पीड़ा कोई ना समझता. अब जब सच में उसके पास एक लड़की बैठी है, तो उसके मन में तरह-तरह के विचार आने शुरू हो गए. हलके रंग की सूती की सलवार-कमीज़, खुले बाल,आँखों में काजल,सिर्फ इतने में कोई कैसे इतना सुन्दर लग सकता है, इसी सोच में प्रफुल डूबा था. पर लड़की को इस तरह बार-बार देखना भी उसे गलत लग रहा था. क्या वो बात शुरू करे? क्या पूछे? इन्ही सवालों के उधेड़बुन में वह बुरी तरह फंस चुका था. अंततः कायरता के हाथों आत्मसमर्पण कर प्रफुल ऊपर अपने बर्थ पर चला गया और लेटते ही सो भी गया. 'टीटी' के जगाने पर जब उसकी नींद खुली तो रात के १२.३० बज चुके थे. उसकी नज़र नीचे पड़ी तो उसने देखा उस लड़की के पास एक और आदमी बैठा है. उसे समझ नहीं आया कि ये आदमी कब आया, वहां क्यों बैठा है और लड़की भी बिना कुछ कहे चुपचाप क्यों बैठी है ? जब 'टीटी' दोनों के टिकट देखकर बिना कुछ कहे चला गया तो प्रफुल से और रहा ना गया; वह नीचे आ गया. लड़की के नजदीक जाकर उसने कहा- "माफ़ कीजिए, क्या ये आपका बर्थ नहीं है"?लड़की ने कहा-"है,पर आधा. दरअसल मेरा टिकट आर.ए.सी है". अब प्रफुल को सब समझ में आ गया. आर.ए.सी. में एक बर्थ में दो जन को बैठना होता है. पर प्रफुल को उस लड़की के लिए बुरा लग रहा था. उसे अपनी स्थिति याद आ रही थी कि किस तरह वह तनाव ग्रस्त हो गया था जब उसका टिकट पक्का नहीं हुआ था. कुछ सोचकर उसने लड़की से फिर कहा- "देखिये, मुझे गलत मत समझिये, आप काफी देर से इस तरह सिकुड़ कर बैठीं हैं, कृपया आप ऊपर मेरी बर्थ में जाकर कुछ देर आराम कर लीजिए".
लड़की ने कहा- "नहीं नहीं, उसकी कोई ज़रूरत नहीं, आप खामख्वाह मेरे लिए तकलीफ मत उठाइये. मैं यहाँ ठीक हूँ."
प्रफुल बोला- "देखिए, दो रातों का सफ़र है. इस तरह आपकी तबीयत बिगड़ जाएगी. वैसे भी मैं काफी देर सो चूका हूँ.इसलिए मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी. आप कुछ देर सो लीजिए. मैं यहाँ बैठ जाता हूँ."
प्रफुल ने इतनी सच्चाई से बात की,कि लड़की इस बार जगह से उठी और 'धन्यवाद' कहकर ऊपर चढ़ गई. लगभग पाँच बजे प्रफुल की आँखे खुली. ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी थी. प्रफुल को अपने ऊपर अचम्भा हुआ कि बैठे-बैठे ही वो किस तरह सो गया था. उसके बगल वाला आदमी भी बैठे-बैठे खर्राटे ले रहा था. लड़की ठीक तो है देखने के लिए वो ज़रा खड़ा हो गया और उस अपूर्व दृश्य को देखकर वो जैसे वहीँ जम गया. गुलाबी होंठ, धनुष सी भौंहें, माथे पर जुल्फों के एक दो लट, और चेहरे पे सुकून देखकर प्रफुल का दिल जैसे मचल उठा. इससे पहले क्या कभी उसने ऐसा स्वर्गीय दृश्य देखा था? चाय वाले के धक्के से जैसे वो धरती पर उतर आया और अपने बचपने पर उसे हँसी आ गई.
अबकी प्रफुल और न सो पाया. उसकी आँखों के आगे तो सिर्फ लड़की का चेहरा घूम रहा था. आजतक कभी भी उसे ऐसा कुछ अनुभव नहीं हुआ. अब तो उसे लड़की के जागने का इंतज़ार था क्योंकि उसे विश्वास था कि अबकी तो लड़की ही बात करेगी. सात बजे के आसपास प्रफुल ने चाय वाले को पुकारा तो ऊपर से लड़की की आवाज़ आई- "एक और चाय इधर ऊपर भी". प्रफुल ने सर ऊपर उठाया तो लड़की उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी. चाय लेते लेते लड़की नीचे आ गई और प्रफुल के पास जा बैठी. प्रफुल के बगल वाला आदमी तब कहीं गया हुआ था. चाय का दाम देते वक़्त दोनों ने 'मैं, मैं' किया पर प्रफुल की ही जीत हुई. प्रफुल ने पूछा- "नींद तो ठीक से हुई न होगी आपकी"? तो लड़की ने कहा- "सच कहूँ, बहुत अच्छी नींद आई. पर मेरे कारण आप तो ज़रा भी न सोये होंगे"? तो प्रफुल ने कहा- "नहीं.नहीं, वैसी कोई बात नहीं, मुझे तो बैठे-बैठे भी अच्छी नींद आई. फिर मैं तो पहले भी काफी सो चुका था. हॉस्टल में रहने वालों को आप कहीं भी डाल दो, वो ठीक सो लेता है". यह सुनकर दोनों हँसने लगे और शुरू हो गयी उनकी बातें. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों एक दूसरे को कितने सालों से जानते हों. इसी बीच वह दूसरा आदमी भी उतर गया और अब वो दोनों और खुलकर बाते करने लग गए. उनके बीच जैसे कोई दुराव न था.एक दूसरे के बारे में उन्होंने काफी बातें जान लीं.
लड़की का नाम लिली था. वह भी पुणे में पढ़ रही थी-'जर्नलिस्म'. पुणे के एक फ्लैट में वह तीन लड़कियों के साथ रहती थी. बचपन में उसके पिता का देहांत हो चुका था. उसके बड़े भैया कड़क किस्म के थे. उसकी माँ सरकारी स्कूल की अध्यापिका थी. उसके दोस्तों की संख्या गिनी-चुनी थी, जिनमे लड़के तो लगभग थे ही नहीं. लिली के बारे में इस तरह की कई बातें प्रफुल को पता चलीं. प्रफुल ने भी बेझिझक अपने बारे में बहुत कुछ कह डाला. उस रात दोनों अपने अपने बर्थ में सो गए. सुबह जब उतरने का वक़्त आया तो प्रफुल ने लिली को उसके घर तक छोड़ना चाहा, पर लिली राज़ी ना हुई. ये तो साफ़ था कि दोनों ही एक दूसरे की ओर खींचे हुए थे, दोनों और साथ रहना चाहते थे, और बातें करना चाहते थे. प्रफुल ने ही अंत में लिली से उसका नंबर माँगा. लिली को जैसे इसी का इंतजार था. उसने अपना मोबाईल नंबर और ई-मेल पता प्रफुल को दे दिया. प्रफुल ने भी अपना पता और नंबर दिया.
इसके बाद कहाँ से क्या हुआ किसी को कुछ खबर न हुई. एक साल के बीच प्रफुल और लिली एक दूसरे के प्यार में डूब चुके थे. साथ साथ जीने मरने की कसमें खा चुके थे. जो भी उनकी जोड़ी को देखता, बस एक ही बात कहता- परफेक्ट, किसी की नज़र न लगे. इस तरह पांच साल बीत गए. दोनों अच्छी नौकरियाँ करने लगे. उनके प्यार में पर रत्ती भर भी कमी ना आई.
पर इंसान को जो अच्छा लगे, भगवान को वो हमेशा मंज़ूर नहीं होता. प्रफुल ब्राह्मण था और लिली अनुसूचित जाति की. इस रिश्ते से ना तो प्रफुल के घर वाले खुश थे और ना ही लिली के. लिली के भाई को जब इस रिश्ते के बारे में पता चला तो उन्होंने लिली पर हाथ भी उठाया. पर प्यार इन्सान को ढीठ बना देता है. सब तरह से समझाने के बावजूद जब कोई राज़ी ना हुआ तो उन्होंने घर छोड़ने का फैसला लिया. प्रफुल की माँ लिली से एकबार मिली थी और उन्हें लिली बहुत पसंद आई थी. पर पिताजी के डर से वो कुछ कर ना पाई. जब प्रफुल घर से बाहर जाने लगा तो उसकी माँ ने सिंदूर की एक डिबिया देकर कहा- "मेरा आशीर्वाद तुम दोनों के साथ हमेशा रहेगा".
प्रफुल और लिली ने कोर्ट में जाकर शादी कर ली. शादी की खबर देने के लिए लिली ने आखरी बार अपनी माँ को यह सोचकर फोन लगाया कि शायद उसे उनका आशीर्वाद मिल जाए, पर माँ ने यह कहकर फोन काट दिया कि उनकी कोई बेटी नहीं है.
लिली ने प्रफुल में और प्रफुल ने लिली में ही अपना सर्वस्व ढूंढ़ लिया. दोनों ने अपना प्यारा सा घर बसाया. अब दोनों ने चाहा कि उनका परिवार पूरा हो. पर नियति के आगे किसकी कब चली? लिली को किसी तरह गर्भ नहीं ठहरता. बड़े बड़े डॉक्टरों के दरवाजे खटखटाए. पर सब व्यर्थ. आशा की आखरी किरण मानकर चिकित्सा के लिए वे वेलोर गए. वहाँ अस्पताल में अचानक ही उनकी
मुलाकात लिली की माँ से हो गई. माँ के दिल का एक बड़ा आपरेशन होना था. एक दूसरे को इस प्रकार अप्रत्याशित देखकर वहाँ जैसे कोई दैवीय घटना घट गई. माँ बेटी दोनों एक दूसरे से लिपटकर बेतहाशा रोने लगे. लिली के भैया की भी आँखें नम हो आई. माँजी ने प्रफुल को भी गले से लगा लिया और बहुत रोई, अपनी गलतियों पर पछताई. उन्होंने उनसे आशीर्वाद लिया.
रात को लिली ने प्रफुल से कहा-"क्यों ना एक आखरी बार तुम जाकर अपने पिताजी से बात करो. मुझे लग रहा है कि अब सब अच्छा अच्छा सा होगा". लिली की बातों में एक गहरा विशवास-सा था जिसे प्रफुल नकार ना सका. उसने घर पर फोन लगाया. प्रफुल की माँ ने फोन उठाया, और प्रफुल की आवाज़ पा फुटफुटकर रोने लगीं. माँ ने कहा जब से प्रफुल घर छोड़कर गया है, उसके पापा तो जैसे गूंगे से बन गए हैं. इतने में पीछे से पिताजी की आवाज़ आई-"प्रफुल है क्या"?? और वो फोन पर आ गए. प्रफुल चुप था. उधर पिताजी भी. फिर प्रफुल ने ही कहा-"पापा, प्रणाम, कैसे हैं आप"? बस इतना कहना था कि पिताजी की भी अश्रुधारा फूट पड़ी. कहने लगे- "बेटा, मेरी बहु को लेकर घर लौट आ. जाति से इंसान की पहचान नहीं होती, होती है तो उसके संस्कारों से. मैं जानता हूँ लिली बहुत अच्छी लड़की है. वह हम सबसे प्यार करती है. जीवन के इन आखरी क्षणों में बेटे-बहु का सुख ना मिले तो परलोक में भी शांति ना मिलेगी. फिर ईश्वर को मुँह भी तो दिखाना है. उसने तो ये सब जातियों के भेद ना बनाये बेटा. लिली को लेकर घर आजा. मै उसका गुनाहगार हूँ. उससे भी मैं माफ़ी मांग लूँगा." लिली ये सारी बातें स्पीकर पर सुन रही थी. पापा की बातें सुनकर वो रोने लग गई. वह फोन पर आई और पापा से बोली-"ये आप क्या कह रहे हैं पिताजी? कभी सुना है आपने पिता को बच्चों से माफ़ी मांगते हुए? मेरे पिता की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी. हमेशा से मैं उनके प्यार के लिए तरसी हूँ. प्रफुल जब कभी मुझसे कहते कि आपने उन्हें डांटा तो मैं उन्हें समझाती कि ये तो उनका प्यार है, उन्हें तुम्हारी फिकर है. मुझे इनकी कीमत मालूम है पिताजी. मुझे हमेशा यही लगता कि क्या हुआ अगर मेरे पापा नहीं हैं,प्रफुल के पिता ही मेरे पिता हैं. पिताजी, आपने मुझे अपनी बेटी मान लिया, इससे बढ़कर मेरे लिए इस दुनिया में और कुछ नहीं."
दूर बैठकर प्रफुल ये सब सुन रहा था. उसे अपने भाग्य पर हँसी आ रही थी कि सब ठीक हुआ तो भी कहाँ? अस्पताल में आकर? और जब हुआ तो एक साथ इतना कुछ? उसने एक बार अपने हाथ में चिकोटी भी काटी, खुद को यकीन दिलाने के लिए कि कहीं ये सब सपना तो नहीं. उधर लिली इन डॉक्टरों के चक्कर से जहाँ कुछ टूट सी गई थी वहीँ इतना कुछ हो जाने पर अचानक ही उसमें एक नई उमंग सी जाग गई. कहते हैं ना कि बड़ों के आशीष में दम होता है. कुछ परीक्षणों के बाद डॉक्टरों ने भी धीरज धरने को कहा. मांजी का आपरेशन भी सफल रहा. लिली और प्रफुल कुछ दिन वहीँ वेलोर में ठहरे और इन्हीं दिनों एक सुन्दर सी सुबह लिली ने प्रफुल के कानों में आकर कहा-"पापा बनने के लिए तैयार हो ना"?
कुछ ऐसा ही हाल था पुणे के एक इन्जिनीयरिंग के छात्र प्रफुल की. टिकट तालिका की प्रतीक्षा में पिछले एक घंटे से वो स्टेशन के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रातः भ्रमण कर रहा था. आने से पहले इन्टरनेट पर उसने अपनी टिकट की स्थिति जाँच ली थी. वह प्रतीक्षा-सूची के २ नंबर पर थी. उसे आशा थी कि ट्रेन के छूटने से पहले तक टिकट पक्की हो जाएगी. पुणे से कलकत्ता दो रात की यात्रा है. अगर टिकट पक्का नहीं होता है तो दो रात किस तरह काटने होंगे की कल्पना मात्र से उसके चलने की गति और बढ़ जाती. अंत में वह वक्त आ ही गया, और तालिका के टंगते ही भीड़ उमड़ पड़ी. किसी तरह उसने देख ही लिया कि उसकी टिकट पक्की हो गई है. दिमाग से एक भारी बोझ सा उतर गया. तभी उसकी नज़र उसके पास खड़ी लगभग उसी के उम्र की एक लड़की पर पड़ी जिसका चेहरा उतरा हुआ-सा था और आँखें लाल हो आई थीं. इतने में ट्रेन भी लग गई और चारों तरफ एक भगदड़ सी मच गई. प्रफुल को कुछ खास जल्दी तो थी नहीं. आखिर टिकट जो पक्का था. इत्मीनान से जब वो अपनी बर्थ पर गया तो उसी लड़की को डरी-सहमी सी वहीँ बैठे पाया. प्रफुल का बर्थ ऊपर था. उसे लगा नीचे वाला बर्थ लड़की का होगा. उसने अपना सामान सीट के नीचे लगा दिया और बैठ गया. ट्रेन चल पड़ी.
प्रफुल लगभग ६ महीने बाद अपने घर कलकत्ता जा रहा था. भाई-बहन, माँ-पापा से मिलने को उसका दिल बड़ा आतुर था. पर सबसे ज्यादा ख़ुशी उसे इस बात की हो रही थी कि उसके बगल में एक लड़की बैठी है. हर बार किसी भी तरह की यात्रा से पहले वो ईश्वर से प्रार्थना करता कि कोई अच्छी सी लड़की उसके साथ सफ़र करें, ताकि उससे बातें हों और सफ़र मजे से कटे. पर इसबार टिकट की चिंता में, प्रार्थना के बारे में वह भूल ही गया था. इसलिए वह मन ही मन भगवान् का शुक्रिया अदा करते नहीं थक रहा था कि बिन मांगे ही उसने उसकी सुन ली. दरअसल प्रफुल बड़ा ही अच्छा लड़का था. उसने कभी भी किसी लड़की को बुरी नज़र से नहीं देखा. कालेज में सब उसे 'बच्चा' कहकर चिढ़ाते थे. मन ही मन वह चाहता था कि उसकी भी कोई गर्लफ्रेंड हो, पर एक तो उसकी हिम्मत नहीं होती किसी भी लड़की से पहल करने की, और दूसरी, सब लड़कियां उसे अपने भाई जैसा मानती थीं. बेचारे के मन की पीड़ा कोई ना समझता. अब जब सच में उसके पास एक लड़की बैठी है, तो उसके मन में तरह-तरह के विचार आने शुरू हो गए. हलके रंग की सूती की सलवार-कमीज़, खुले बाल,आँखों में काजल,सिर्फ इतने में कोई कैसे इतना सुन्दर लग सकता है, इसी सोच में प्रफुल डूबा था. पर लड़की को इस तरह बार-बार देखना भी उसे गलत लग रहा था. क्या वो बात शुरू करे? क्या पूछे? इन्ही सवालों के उधेड़बुन में वह बुरी तरह फंस चुका था. अंततः कायरता के हाथों आत्मसमर्पण कर प्रफुल ऊपर अपने बर्थ पर चला गया और लेटते ही सो भी गया. 'टीटी' के जगाने पर जब उसकी नींद खुली तो रात के १२.३० बज चुके थे. उसकी नज़र नीचे पड़ी तो उसने देखा उस लड़की के पास एक और आदमी बैठा है. उसे समझ नहीं आया कि ये आदमी कब आया, वहां क्यों बैठा है और लड़की भी बिना कुछ कहे चुपचाप क्यों बैठी है ? जब 'टीटी' दोनों के टिकट देखकर बिना कुछ कहे चला गया तो प्रफुल से और रहा ना गया; वह नीचे आ गया. लड़की के नजदीक जाकर उसने कहा- "माफ़ कीजिए, क्या ये आपका बर्थ नहीं है"?लड़की ने कहा-"है,पर आधा. दरअसल मेरा टिकट आर.ए.सी है". अब प्रफुल को सब समझ में आ गया. आर.ए.सी. में एक बर्थ में दो जन को बैठना होता है. पर प्रफुल को उस लड़की के लिए बुरा लग रहा था. उसे अपनी स्थिति याद आ रही थी कि किस तरह वह तनाव ग्रस्त हो गया था जब उसका टिकट पक्का नहीं हुआ था. कुछ सोचकर उसने लड़की से फिर कहा- "देखिये, मुझे गलत मत समझिये, आप काफी देर से इस तरह सिकुड़ कर बैठीं हैं, कृपया आप ऊपर मेरी बर्थ में जाकर कुछ देर आराम कर लीजिए".
लड़की ने कहा- "नहीं नहीं, उसकी कोई ज़रूरत नहीं, आप खामख्वाह मेरे लिए तकलीफ मत उठाइये. मैं यहाँ ठीक हूँ."
प्रफुल बोला- "देखिए, दो रातों का सफ़र है. इस तरह आपकी तबीयत बिगड़ जाएगी. वैसे भी मैं काफी देर सो चूका हूँ.इसलिए मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी. आप कुछ देर सो लीजिए. मैं यहाँ बैठ जाता हूँ."
प्रफुल ने इतनी सच्चाई से बात की,कि लड़की इस बार जगह से उठी और 'धन्यवाद' कहकर ऊपर चढ़ गई. लगभग पाँच बजे प्रफुल की आँखे खुली. ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी थी. प्रफुल को अपने ऊपर अचम्भा हुआ कि बैठे-बैठे ही वो किस तरह सो गया था. उसके बगल वाला आदमी भी बैठे-बैठे खर्राटे ले रहा था. लड़की ठीक तो है देखने के लिए वो ज़रा खड़ा हो गया और उस अपूर्व दृश्य को देखकर वो जैसे वहीँ जम गया. गुलाबी होंठ, धनुष सी भौंहें, माथे पर जुल्फों के एक दो लट, और चेहरे पे सुकून देखकर प्रफुल का दिल जैसे मचल उठा. इससे पहले क्या कभी उसने ऐसा स्वर्गीय दृश्य देखा था? चाय वाले के धक्के से जैसे वो धरती पर उतर आया और अपने बचपने पर उसे हँसी आ गई.
अबकी प्रफुल और न सो पाया. उसकी आँखों के आगे तो सिर्फ लड़की का चेहरा घूम रहा था. आजतक कभी भी उसे ऐसा कुछ अनुभव नहीं हुआ. अब तो उसे लड़की के जागने का इंतज़ार था क्योंकि उसे विश्वास था कि अबकी तो लड़की ही बात करेगी. सात बजे के आसपास प्रफुल ने चाय वाले को पुकारा तो ऊपर से लड़की की आवाज़ आई- "एक और चाय इधर ऊपर भी". प्रफुल ने सर ऊपर उठाया तो लड़की उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी. चाय लेते लेते लड़की नीचे आ गई और प्रफुल के पास जा बैठी. प्रफुल के बगल वाला आदमी तब कहीं गया हुआ था. चाय का दाम देते वक़्त दोनों ने 'मैं, मैं' किया पर प्रफुल की ही जीत हुई. प्रफुल ने पूछा- "नींद तो ठीक से हुई न होगी आपकी"? तो लड़की ने कहा- "सच कहूँ, बहुत अच्छी नींद आई. पर मेरे कारण आप तो ज़रा भी न सोये होंगे"? तो प्रफुल ने कहा- "नहीं.नहीं, वैसी कोई बात नहीं, मुझे तो बैठे-बैठे भी अच्छी नींद आई. फिर मैं तो पहले भी काफी सो चुका था. हॉस्टल में रहने वालों को आप कहीं भी डाल दो, वो ठीक सो लेता है". यह सुनकर दोनों हँसने लगे और शुरू हो गयी उनकी बातें. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों एक दूसरे को कितने सालों से जानते हों. इसी बीच वह दूसरा आदमी भी उतर गया और अब वो दोनों और खुलकर बाते करने लग गए. उनके बीच जैसे कोई दुराव न था.एक दूसरे के बारे में उन्होंने काफी बातें जान लीं.
लड़की का नाम लिली था. वह भी पुणे में पढ़ रही थी-'जर्नलिस्म'. पुणे के एक फ्लैट में वह तीन लड़कियों के साथ रहती थी. बचपन में उसके पिता का देहांत हो चुका था. उसके बड़े भैया कड़क किस्म के थे. उसकी माँ सरकारी स्कूल की अध्यापिका थी. उसके दोस्तों की संख्या गिनी-चुनी थी, जिनमे लड़के तो लगभग थे ही नहीं. लिली के बारे में इस तरह की कई बातें प्रफुल को पता चलीं. प्रफुल ने भी बेझिझक अपने बारे में बहुत कुछ कह डाला. उस रात दोनों अपने अपने बर्थ में सो गए. सुबह जब उतरने का वक़्त आया तो प्रफुल ने लिली को उसके घर तक छोड़ना चाहा, पर लिली राज़ी ना हुई. ये तो साफ़ था कि दोनों ही एक दूसरे की ओर खींचे हुए थे, दोनों और साथ रहना चाहते थे, और बातें करना चाहते थे. प्रफुल ने ही अंत में लिली से उसका नंबर माँगा. लिली को जैसे इसी का इंतजार था. उसने अपना मोबाईल नंबर और ई-मेल पता प्रफुल को दे दिया. प्रफुल ने भी अपना पता और नंबर दिया.
इसके बाद कहाँ से क्या हुआ किसी को कुछ खबर न हुई. एक साल के बीच प्रफुल और लिली एक दूसरे के प्यार में डूब चुके थे. साथ साथ जीने मरने की कसमें खा चुके थे. जो भी उनकी जोड़ी को देखता, बस एक ही बात कहता- परफेक्ट, किसी की नज़र न लगे. इस तरह पांच साल बीत गए. दोनों अच्छी नौकरियाँ करने लगे. उनके प्यार में पर रत्ती भर भी कमी ना आई.
पर इंसान को जो अच्छा लगे, भगवान को वो हमेशा मंज़ूर नहीं होता. प्रफुल ब्राह्मण था और लिली अनुसूचित जाति की. इस रिश्ते से ना तो प्रफुल के घर वाले खुश थे और ना ही लिली के. लिली के भाई को जब इस रिश्ते के बारे में पता चला तो उन्होंने लिली पर हाथ भी उठाया. पर प्यार इन्सान को ढीठ बना देता है. सब तरह से समझाने के बावजूद जब कोई राज़ी ना हुआ तो उन्होंने घर छोड़ने का फैसला लिया. प्रफुल की माँ लिली से एकबार मिली थी और उन्हें लिली बहुत पसंद आई थी. पर पिताजी के डर से वो कुछ कर ना पाई. जब प्रफुल घर से बाहर जाने लगा तो उसकी माँ ने सिंदूर की एक डिबिया देकर कहा- "मेरा आशीर्वाद तुम दोनों के साथ हमेशा रहेगा".
प्रफुल और लिली ने कोर्ट में जाकर शादी कर ली. शादी की खबर देने के लिए लिली ने आखरी बार अपनी माँ को यह सोचकर फोन लगाया कि शायद उसे उनका आशीर्वाद मिल जाए, पर माँ ने यह कहकर फोन काट दिया कि उनकी कोई बेटी नहीं है.
लिली ने प्रफुल में और प्रफुल ने लिली में ही अपना सर्वस्व ढूंढ़ लिया. दोनों ने अपना प्यारा सा घर बसाया. अब दोनों ने चाहा कि उनका परिवार पूरा हो. पर नियति के आगे किसकी कब चली? लिली को किसी तरह गर्भ नहीं ठहरता. बड़े बड़े डॉक्टरों के दरवाजे खटखटाए. पर सब व्यर्थ. आशा की आखरी किरण मानकर चिकित्सा के लिए वे वेलोर गए. वहाँ अस्पताल में अचानक ही उनकी
मुलाकात लिली की माँ से हो गई. माँ के दिल का एक बड़ा आपरेशन होना था. एक दूसरे को इस प्रकार अप्रत्याशित देखकर वहाँ जैसे कोई दैवीय घटना घट गई. माँ बेटी दोनों एक दूसरे से लिपटकर बेतहाशा रोने लगे. लिली के भैया की भी आँखें नम हो आई. माँजी ने प्रफुल को भी गले से लगा लिया और बहुत रोई, अपनी गलतियों पर पछताई. उन्होंने उनसे आशीर्वाद लिया.
रात को लिली ने प्रफुल से कहा-"क्यों ना एक आखरी बार तुम जाकर अपने पिताजी से बात करो. मुझे लग रहा है कि अब सब अच्छा अच्छा सा होगा". लिली की बातों में एक गहरा विशवास-सा था जिसे प्रफुल नकार ना सका. उसने घर पर फोन लगाया. प्रफुल की माँ ने फोन उठाया, और प्रफुल की आवाज़ पा फुटफुटकर रोने लगीं. माँ ने कहा जब से प्रफुल घर छोड़कर गया है, उसके पापा तो जैसे गूंगे से बन गए हैं. इतने में पीछे से पिताजी की आवाज़ आई-"प्रफुल है क्या"?? और वो फोन पर आ गए. प्रफुल चुप था. उधर पिताजी भी. फिर प्रफुल ने ही कहा-"पापा, प्रणाम, कैसे हैं आप"? बस इतना कहना था कि पिताजी की भी अश्रुधारा फूट पड़ी. कहने लगे- "बेटा, मेरी बहु को लेकर घर लौट आ. जाति से इंसान की पहचान नहीं होती, होती है तो उसके संस्कारों से. मैं जानता हूँ लिली बहुत अच्छी लड़की है. वह हम सबसे प्यार करती है. जीवन के इन आखरी क्षणों में बेटे-बहु का सुख ना मिले तो परलोक में भी शांति ना मिलेगी. फिर ईश्वर को मुँह भी तो दिखाना है. उसने तो ये सब जातियों के भेद ना बनाये बेटा. लिली को लेकर घर आजा. मै उसका गुनाहगार हूँ. उससे भी मैं माफ़ी मांग लूँगा." लिली ये सारी बातें स्पीकर पर सुन रही थी. पापा की बातें सुनकर वो रोने लग गई. वह फोन पर आई और पापा से बोली-"ये आप क्या कह रहे हैं पिताजी? कभी सुना है आपने पिता को बच्चों से माफ़ी मांगते हुए? मेरे पिता की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी. हमेशा से मैं उनके प्यार के लिए तरसी हूँ. प्रफुल जब कभी मुझसे कहते कि आपने उन्हें डांटा तो मैं उन्हें समझाती कि ये तो उनका प्यार है, उन्हें तुम्हारी फिकर है. मुझे इनकी कीमत मालूम है पिताजी. मुझे हमेशा यही लगता कि क्या हुआ अगर मेरे पापा नहीं हैं,प्रफुल के पिता ही मेरे पिता हैं. पिताजी, आपने मुझे अपनी बेटी मान लिया, इससे बढ़कर मेरे लिए इस दुनिया में और कुछ नहीं."
दूर बैठकर प्रफुल ये सब सुन रहा था. उसे अपने भाग्य पर हँसी आ रही थी कि सब ठीक हुआ तो भी कहाँ? अस्पताल में आकर? और जब हुआ तो एक साथ इतना कुछ? उसने एक बार अपने हाथ में चिकोटी भी काटी, खुद को यकीन दिलाने के लिए कि कहीं ये सब सपना तो नहीं. उधर लिली इन डॉक्टरों के चक्कर से जहाँ कुछ टूट सी गई थी वहीँ इतना कुछ हो जाने पर अचानक ही उसमें एक नई उमंग सी जाग गई. कहते हैं ना कि बड़ों के आशीष में दम होता है. कुछ परीक्षणों के बाद डॉक्टरों ने भी धीरज धरने को कहा. मांजी का आपरेशन भी सफल रहा. लिली और प्रफुल कुछ दिन वहीँ वेलोर में ठहरे और इन्हीं दिनों एक सुन्दर सी सुबह लिली ने प्रफुल के कानों में आकर कहा-"पापा बनने के लिए तैयार हो ना"?