पहली नज़र में किसी को देखते ही दिमाग में उस इंसान की एक छवि बन जाती है कि वह कैसा होगा और उसके अनुसार ही हम क्षणिक व्यवहार कर बैठते हैं. उसके बाह्यिक रूप का प्रतिबिम्ब उसके आतंरिक रूप पर पड़ता है और उसी आतंरिक रूप की कल्पना कर हम एक धारणा बनाकर कार्यान्वित होते हैं. बस में चढ़कर अनजाने चेहरों के बीच, जो इंसान इसी धारणा की कसौटी पर खरा उतरता है, हम उसी के पास जाकर बैठते हैं. भीड़ में अगर किसी से कुछ पूछना हो तो हम इसी धारणा को टटोलते हैं. पर हमारी यह धारणा क्या हमेशा सही होती है? किसी इंसान को देखकर उसके चरित्र की एक कल्पना मात्र कर उसके अनुरूप पेश आना इंसानी फितरत है. कभी ऐसी ही धारणा एक लम्बे रिश्ते को जन्म देती है तो कभी यही बहुत बड़े किसी फसाद में फँसने से बचाती भी है. यह तो समय और किस्मत ही तय करता है की आपकी यह छठी इन्द्रीय शक्ति कितनी ताकतवर है.
एक बार मेरी भी इस छठी इन्द्रीय शक्ति को परीक्षा से गुज़रना पड़ा था. पर मेरी जीत हुई या हार, इसका पता तो मेरे अनुभव को पढ़ने के बाद ही चलेगा.
कोलकाता शहर के रास्ते अपनी व्यस्तता के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं. हाथ रिक्शा, ऑटो रिक्शा, बस, ट्राम, ट्रक, गाड़ी, टैक्सी,स्कूटर, बाइक क्या कुछ नहीं चलते वहाँ के संकरे रास्तों पर. और बसों में भी सरकारी, बेसरकारी, मिनी, ट्राम कंपनी, भूतल परिवहन आदि काफी है लोगों को उलझा देने के लिए. फिर कौनसी बस कहाँ जाएगी, हिसाब रखना अत्यंत मुश्किल काम है.
मेरे मोबाईल फोन का एक पुर्जा बिगड़ गया था. चूँकि वह गैरंटी काल के भीतर था, मुझे उसे ग्राहक सेवा केंद्र में देने जाना था. दूकान उत्तर कोलकाता में और मेरा घर दक्षिण कोलकाता में था. अतः मुझे उत्तर कोलकाता के यान-वाहन, सड़कों आदि के बारे में खास जानकारी नहीं थी. फिर भी कौनसी बस से मैं दूकान तक जा सकूँगी का पता लगाकर मैं घर से निकल पड़ी. अपने घर से मुझे गंतव्य तक पहुँचने के लिए दो बार बसें बदलनी थी. पहले पड़ाव तक का रास्ता मैं भली-भाँती जानती थी. पर अगले पड़ाव के लिए मुझे थोड़ी चिंता थी. जहाँ मुझे उतारा गया, उस स्टॉप पर खास भीड़ नहीं थी. मैं अगले बस का इंतज़ार करने लगी. मेरे आस-पास के लोंग आते, और अगले ही बस से निकल जाते. मैं वहीँ खड़ी रह जाती. जल्द ही बस आई. मैं लपकी. परिचालक से जैसे ही पूछा "बड़ा बाज़ार?" तो जवाब आया "नहीं, यह नहीं" और मेरे अगले सवाल से पहले ही बस निकल गयी. मुझे लगा झटका. अगर यह बस नहीं तो फिर कौनसी? मेरे बगल में एक महिला खड़ी थीं. छठी इन्द्रीय शक्ति ने कहा "महिला से पूछा जाये". मैंने उनसे पूछा कि 'बड़ा बाज़ार' कौनसी बस जाएगी? उन्होंने उसी बस का नंबर बताया जिसकी जानकारी मुझे भी थी और जिसने थोड़ी देर पहले ही मुझे मना कर दिया था. मैं असमंजस में पड़ गयी. सोचा अगली बार फिर से कोशिश करुँगी.
लगभग १० मिनट बाद फिर वह बस आई. मैं लपकी. पूछा "बड़ा बाज़ार?" जवाब मिला "नहीं, यह नहीं". मैंने फिर पूछा "फिर कौनसी बस जाएगी?" वह बोला "पीछे आ रही है" कहते हुए निकल गया. और उसी बस में मेरी तत्कालीन स्थिति की एकमात्र मुक्तिदात्री, वह औरत भी उठकर चली गयीं. अब मैं और वह आदमी स्टॉप में अकेले. उस आदमी कि तो जैसे मनोवान्छ्ना पूरी हो गयी. अब बिना किसी रूकाव वह सीधे मुझे देख पा रहा था. मैं सोचने लगी कि पता नहीं अगर वह कोई चोर हो, मुझे चाकू दिखाकर मुझे लूट ले और भाग जाये, तो? और अगर ऐसी वैसी कोई हरकत करे तो मैं क्या करुँगी? आस-पास कोई इंसान या दूकान भी नहीं था कि किसी से मदद ली जा सके. ऊपर से मेरा मोबाईल भी बिगड़ा हुआ. वरना कब कि किसी से बात कर कुछ न कुछ उपाय निकाल लेती. टैक्सी करने में भी मुसीबत थी. शहर में हुये कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण घर से सख्त हिदायत थी कि अकेले टैक्सी में न चढूं. यह सब सोचते सोचते मेरे धैर्य की सीमा पार होती जा रही थी. मैंने सोच लिया कि अगले ५ मिनट में अगर बस ना मिली तो मैं वापस घर चली जाउंगी. वैसे भी घंटे भर में दूकान भी बंद होने वाली थी.
जैसे ही अगली बस आई, मैं भागकर गयी, पूछा "बड़ा बाज़ार?", जवाब आया "नहीं". फिर अगली बस, फिर सवाल, फिर नहीं. एक तरफ वह आदमी, दूसरी तरफ बस का न मिलना, मैं तनावग्रस्त हो गयी. हारकर दो कदम पीछे चली गयी और मेरी नज़र फिर उस आदमी पर पड़ी. अबकी वह मेरी तरफ नहीं देख रहा था. तभी एक बस आई. मैं उस आदमी को देख ही रही थी कि उसने मेरी ओर देखते हुये बस की तरफ अपनी अंगूली उठाकर इशारा किया. मैं अनायास ही बस की ओर बढ़ गयी और जैसे ही परिचालक से पूछा "बड़ा बाज़ार?", उसने तुरंत कहा "हाँ जाएगी, जल्दी चढिये". उठते ही मुझे खिड़की के पास जगह मिल गयी. मैंने सीट पर बैठते ही स्टॉप की ओर देखा. वह आदमी अब भी मुझे देख रहा था. पर अबकी मैंने नज़रें नहीं घुमाई. वरन आभार प्रकट करने की अदा से अपना सिर नीछे करते हुये धन्यवाद कहा. तभी बस भी चल पड़ी और मैंने उसकी आँखों में एक हलकी सी ख़ुशी का आभास पाया.
दूकान पहुंची तो खुद को अंतिम ग्राहक पाया. जाते ही मेरा नंबर आ गया और दस मिनट के भीतर मेरे मोबाईल के बिगड़े पुर्जे को ठीक कर दिया गया.
घर लौटते वक़्त, पूरे सफ़र के दौरान मैं सिर्फ यही सोचती रही कि स्टॉप पर वह आदमी मेरी ओर देखते हुये शायद मेरी परेशानी को समझने की कोशिश कर रहा था, शायद उसे अपनी धारणा बनाने में, अपनी छठी इन्द्रीय शक्ति को व्यवहार में लाने में मुझसे ज्यादा वक़्त लग रहा था. क्या पता दुनिया की कठोरता ने उसकी दृष्टि को ही वैसा अर्थहीन बना दिया हो जिसके वशीभूत वह सबकी ओर एकटक देखता है और अर्थ ढूँढने की कोशिश करता है? अगर उसने उस बस की तरफ इशारा ना किया होता, तो शायद अगली बस पकड़कर मैं घर चली जाती, या फिर हड़बड़ी में किसी गलत बस में चढ़कर और बड़ी मुसीबत को न्यौता दे बैठती.
आदमी का बाहरी रूप कितना धोखेबाज़ होता है. हम एक मिनट में किसी के प्रति कोई धारणा बना लेते हैं जिसे टूटने में भी एक मिनट से ज्यादा नहीं लगता. ज़िन्दगी में कितनी ही बार हम किसी के बाह्यिक रूप से प्रभावित हो उस पर विशवास कर बैठते हैं और जल्द ही उसके आतंरिक रूप के दर्शन होने पर अपनी भूल पर पछताते हैं. पर ऐसे भी मौके आते हैं जब किसी को हीन नज़रों से देखते हुये उसे अविश्वास का पात्र मान बैठकर अंत में उसी से लाभान्वित होते हैं और फिर से अपनी भूल पर पछताते हैं. आज भी किसी को देखकर उसके प्रति विचार बनाने से पूर्व मैं उस बस स्टॉप वाले इंसान के बारे में सोचती हूँ और दिल के कहीं, किसी छोटे से अंश में पश्चात्ताप के बादल घिर आते हैं.
इस बीच एक आदमी, बेघर की तरह दीखता, लम्बे घुंघराले बाल जैसा कि हफ्ते भर से नहाया न हो, लगभग फटने की हालत में कपडे,एक झोला लटकाये आकर स्टॉप में खड़ा हो गया. उसके प्रति मेरी उपर्युक्त धारणा उस छठी इन्द्रीय शक्ति की ही देन थी. मेरी नज़र उसकी तरफ शायद ना जाती अगर स्टॉप में एक और महिला के अलावा सिर्फ हम दो न होते, और वह एकटक मुझे घूर रहा न होता. मुझे अजीब सी बेचैनी हो रही थी. उसकी तरफ न चाहते हुए भी कभी नज़र चली जाती तो वही घूरती आँखें दिखती. मुझे लगने लगा कि यह आदमी ठीक नहीं है. एक तो बस नहीं आ रही थी, ऊपर से यह मुसीबत.
लगभग १० मिनट बाद फिर वह बस आई. मैं लपकी. पूछा "बड़ा बाज़ार?" जवाब मिला "नहीं, यह नहीं". मैंने फिर पूछा "फिर कौनसी बस जाएगी?" वह बोला "पीछे आ रही है" कहते हुए निकल गया. और उसी बस में मेरी तत्कालीन स्थिति की एकमात्र मुक्तिदात्री, वह औरत भी उठकर चली गयीं. अब मैं और वह आदमी स्टॉप में अकेले. उस आदमी कि तो जैसे मनोवान्छ्ना पूरी हो गयी. अब बिना किसी रूकाव वह सीधे मुझे देख पा रहा था. मैं सोचने लगी कि पता नहीं अगर वह कोई चोर हो, मुझे चाकू दिखाकर मुझे लूट ले और भाग जाये, तो? और अगर ऐसी वैसी कोई हरकत करे तो मैं क्या करुँगी? आस-पास कोई इंसान या दूकान भी नहीं था कि किसी से मदद ली जा सके. ऊपर से मेरा मोबाईल भी बिगड़ा हुआ. वरना कब कि किसी से बात कर कुछ न कुछ उपाय निकाल लेती. टैक्सी करने में भी मुसीबत थी. शहर में हुये कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण घर से सख्त हिदायत थी कि अकेले टैक्सी में न चढूं. यह सब सोचते सोचते मेरे धैर्य की सीमा पार होती जा रही थी. मैंने सोच लिया कि अगले ५ मिनट में अगर बस ना मिली तो मैं वापस घर चली जाउंगी. वैसे भी घंटे भर में दूकान भी बंद होने वाली थी.
जैसे ही अगली बस आई, मैं भागकर गयी, पूछा "बड़ा बाज़ार?", जवाब आया "नहीं". फिर अगली बस, फिर सवाल, फिर नहीं. एक तरफ वह आदमी, दूसरी तरफ बस का न मिलना, मैं तनावग्रस्त हो गयी. हारकर दो कदम पीछे चली गयी और मेरी नज़र फिर उस आदमी पर पड़ी. अबकी वह मेरी तरफ नहीं देख रहा था. तभी एक बस आई. मैं उस आदमी को देख ही रही थी कि उसने मेरी ओर देखते हुये बस की तरफ अपनी अंगूली उठाकर इशारा किया. मैं अनायास ही बस की ओर बढ़ गयी और जैसे ही परिचालक से पूछा "बड़ा बाज़ार?", उसने तुरंत कहा "हाँ जाएगी, जल्दी चढिये". उठते ही मुझे खिड़की के पास जगह मिल गयी. मैंने सीट पर बैठते ही स्टॉप की ओर देखा. वह आदमी अब भी मुझे देख रहा था. पर अबकी मैंने नज़रें नहीं घुमाई. वरन आभार प्रकट करने की अदा से अपना सिर नीछे करते हुये धन्यवाद कहा. तभी बस भी चल पड़ी और मैंने उसकी आँखों में एक हलकी सी ख़ुशी का आभास पाया.
दूकान पहुंची तो खुद को अंतिम ग्राहक पाया. जाते ही मेरा नंबर आ गया और दस मिनट के भीतर मेरे मोबाईल के बिगड़े पुर्जे को ठीक कर दिया गया.
घर लौटते वक़्त, पूरे सफ़र के दौरान मैं सिर्फ यही सोचती रही कि स्टॉप पर वह आदमी मेरी ओर देखते हुये शायद मेरी परेशानी को समझने की कोशिश कर रहा था, शायद उसे अपनी धारणा बनाने में, अपनी छठी इन्द्रीय शक्ति को व्यवहार में लाने में मुझसे ज्यादा वक़्त लग रहा था. क्या पता दुनिया की कठोरता ने उसकी दृष्टि को ही वैसा अर्थहीन बना दिया हो जिसके वशीभूत वह सबकी ओर एकटक देखता है और अर्थ ढूँढने की कोशिश करता है? अगर उसने उस बस की तरफ इशारा ना किया होता, तो शायद अगली बस पकड़कर मैं घर चली जाती, या फिर हड़बड़ी में किसी गलत बस में चढ़कर और बड़ी मुसीबत को न्यौता दे बैठती.
आदमी का बाहरी रूप कितना धोखेबाज़ होता है. हम एक मिनट में किसी के प्रति कोई धारणा बना लेते हैं जिसे टूटने में भी एक मिनट से ज्यादा नहीं लगता. ज़िन्दगी में कितनी ही बार हम किसी के बाह्यिक रूप से प्रभावित हो उस पर विशवास कर बैठते हैं और जल्द ही उसके आतंरिक रूप के दर्शन होने पर अपनी भूल पर पछताते हैं. पर ऐसे भी मौके आते हैं जब किसी को हीन नज़रों से देखते हुये उसे अविश्वास का पात्र मान बैठकर अंत में उसी से लाभान्वित होते हैं और फिर से अपनी भूल पर पछताते हैं. आज भी किसी को देखकर उसके प्रति विचार बनाने से पूर्व मैं उस बस स्टॉप वाले इंसान के बारे में सोचती हूँ और दिल के कहीं, किसी छोटे से अंश में पश्चात्ताप के बादल घिर आते हैं.