हमारी कक्षा में ५ लड़कियों के एक छत्ते को हमने ‘छम्मक छल्लो’ नाम दिया था. दिन भर मधुमक्खियों की तरह अपनों में भिनभिनाती रहती थी. साथ ही उनके कपड़े, चमकीले सितारे जड़े सलवार कमीज़, छोटे छोटे आवाज़ करते घुंगरुओं से भरे दुपट्टे, कानों में बड़े जड़ाऊ बाली, तडकते भडकते जूते चीख चीख कर उस नाम की गवाही देते. उन्हें पूरी कक्षा से कुछ लेना देना न था. वैसे भी एक व्यावसायिक पाठयक्रम में एक दूसरे से खास ज़रूरत पड़ती न थी. लड़कियों की मनोवृत्ति के आधार पर पूरी कक्षा अलग अलग गुटों में बंटी हुई थी. अपनी लड़कीनुमा अंदाज़ के अभाव में मैं किसी भी दल का अंश न बन पायी और स्वच्छंद सब टोलियों की मूक द्रष्टा बनी रही.
उन ‘छम्मक छल्लो’ में एक थी फातिमा. बहुत ज्यादा गोरी, अरक्त दिखने की सीमा तक, नाक छिदी हुई, नैन नक्श पैने, घुंघराले बाल लिए वो आकर्षक तो कही ही जा सकती थी. अपने छत्ते में मग्न, कभी दूसरों से बात करने की ज़रूरत महसूस न करने वाली फातिमा ने सबकी नज़र अपनी ओर उस दिन घुमा ली जिस दिन दरवाज़े से प्रवेश करते हुए सबने उसके बालों को जामुनी लाल रंग में परिवर्तित हो बिलकुल सीधे धागे सरीख सर से चिपटे देखा. सबकी आँखों को झटका लगा क्योंकि उसके भूरे घुंघराले बाल बिलकुल बदल चुके थे. उसके गोरे रंग पर लाल बाल बहुत बुरे नहीं लग रहे थे. बस, होना क्या था. सब लड़कियों की टीका-टिप्पणी शुरू हो गयी. फातिमा को घेरे लड़कियां पूछने लगी कहाँ से बाल सीधे करवाए, कौनसा रंग करवाया, किस ‘ब्रांड’ की है इत्यादि. किसीने जैसे ही पैसों की बात छेडी तो उसकी आवाज़ कुछ ज्यादा ऊँची हो गयी. ऐलान करने जैसी भंगिमा में वह बोली कि ये बदलाव उसके तथाकथित ‘बॉय फ्रेंड’ की उसके जन्मदिन पर भेंट है. यह बात पैसों के सवाल का जवाब कम और अपने ‘बॉय फ्रेंड’ होने की बात पर प्रकाश डालना ज्यादा थी. उसने तो बस चारा डाला था, और कबूतरनुमा लड़कियां बिलकुल सही फँसी. मुद्दा बालों से बॉय फ्रेंड पर घूम गया. यद्यपि इस ‘बॉय फ्रेंड’ नामक प्रजाति से हमारी कक्षा में शायद ही कोई वाकिफ न था, फिर भी इस बारे में कुछ विशेष आकर्षण लिए पैदा हुई नारी योनी की अपनी उत्कंठा दबाए नहीं दबती. फातिमा को जैसे इसी का इंतज़ार था. वह शुरू हो गयी. दोष मेरे नारी होने को दूँ, या फिर फातिमा की ऊँची आवाज़ को कि उन सबकी बातें अंतिम पंक्ति से पहली पंक्ति की दूरी आसानी से तय करती हुई मेरे कानों तक उड़ उड़ कर पहुँचने लगी.
पता चला कि उसकी शादी तय हो चुकी है आसिफ के साथ. वह उसे हर दिन कॉलेज के बाद लेने आता है. उसका अपना रेस्टोरेंट है. वह उससे बहुत प्यार करता है आदि आदि. फातिमा कुछ ज्यादा ही चहक रही थी जैसे कि दुनिया में सिर्फ उसका ही बॉय फ्रेंड है और वह भी प्यार करने वाला. उसके बाद से तो आसिफ एक आम नाम था फातिमा की बातों का. कक्षा की ५० लड़कियों में से ४५ के ही या तो बॉय फ्रेंड थे या फिर सगाई हो चुकी थी पर किसी के भी बारे में पूरी कक्षा को कोई खबर न थी सिवाय फातिमा के. कब उसके ससुराल वाले घर आ रहे हैं, कब आसिफ ने उसके साथ क्या बातें की, किसने किसे क्या तोहफा दिया, किसी न किसी तरह हमारे कानों तक पहुँच ही जाती थी.
कुछ दिनों बाद एकदिन जब मैं लाइब्ररी से कक्षा में दाखिल हुई तो देखा लड़कियां किसी को घेरकर खडीं हैं. सामने गयी तो देखा फातिमा सब के बीच बैठी रो रही है. हमारे पूछने पर कि क्या हुआ, वह थोड़ी सतर्क हो गयी और बोली कि हम सब वहाँ भीड़ ना करे, कुछ नहीं हुआ. बाद में इधर उधर से पता चला कि आसिफ के साथ कुछ कहा-सुनी हुई है. यह पाठ्यक्रम ऐसा था कि लड़कियों को अपनी जन्मजात ‘स्वार्थपरता’ की खासियत दिखाने का भरपूर मौका मिलता था, कोई किसी का दोस्त ना था, कोई अपना ना था. अपने ‘नोट्स’, ‘लाईब्ररी वर्क’, सब अपने तक ही सीमित थे. इसलिए मुझे फातिमा के ये दिखावे अजीब लगते थे कि निजी जीवन में जो भी हो, उसका इस तरह प्रचार करने का क्या अर्थ?
मेरे मन का भ्रम कुछ दूर हुआ जब फातिमा के साथ दिव्या की कुछ खास ही दोस्ती दिखनी लगी. हर वक्त साथ रहना, एक दूसरे की मदद करना आदि दिख रहा था. दिव्या की शादी हो चुकी थी. वह हिंदू ब्राह्मिण थी. एकदिन वह अपनी शादी की कुछ तसवीरें कक्षा में ले आई. तस्वीरों से पता चला कि उसके देवर और पति जुड़वाँ भाई हैं. वे बिलकुल एक जैसे दीखते थे. कुछ चेहरे होते हैं जिनमे से उनका भोलापन झलकता है. भले ही वो सच में उतने सीधे ना हो, फिर भी चेहरा मासूमियत की गवाही देता है. ये जुड़वे भाई वैसे ही भोले दीखते थे. थोड़े गोलू गोलू से, एक बचपने भरी हंसी लिए. हमे उनसे लेना देना तो कुछ था नहीं इसलिए सिर्फ तस्वीरें देखकर मन ही मन अंदाजा लगा लिया कि दिव्या बहुत किस्मत वाली है जो उसे उतना प्यारा पति मिला था.
फिर हमारी परीक्षाओं के लिए छुट्टियाँ शुरू हो गयी. सब अपनी पढाई को लेकर इतने व्यस्त हो गए कि किसीको किसी बात की सुध न रही. कभी किसी जानकारी के लिए एक दूसरे को फोन करते तो एक दो खबर मिलती कि किसी की नौकरी लग गयी या फिर किसी की शादी हो गयी पर फातिमा की किसीने कोई खबर न दी.
एक बहुत बड़ा झटका उसदिन लगा जब हम ३ महीने बाद परीक्षा के लिए फिर से कॉलेज में मिले. जिन-जिन की शादी की खबर मिली थी, वह सब अपने पति के साथ आयीं थी और दोस्तों से मिलवा रहीं थी. जिन्हें पहले सिर्फ ‘जींस टी-शर्ट’ में देखा था, वह आज सलवार-कमीज़ पहन आयीं थी. परीक्षा की अंतिम तैयारियों और चिंताओं के बीच ये झलकियाँ कुछ आरामदायक थीं. पर अचानक एक बार फिर से सबकी नज़र किसी पे अटकी- “फातिमा”.
पीले चटकदार रंग की साड़ी, गले से दो हाथ तक नीचे झूलता मंगलसूत्र, माँग में केसरी सिंदूर, हाथ में कंगन, गले में एक और हार, चीख-चीख कर अपने शादी-शुदा होने का परिचय दे रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि वह किसी बारात में हिस्सा लेने आई थी या फिर परीक्षा देने. उसका पति तो दिखा नहीं, पर एक बात समझ नहीं आ रही थी कि मुसलमान होकर मंगलसूत्र और सिंदूर कैसे? आसिफ तो वैसे ही उसे कॉलेज से लेने आता था तो आज परीक्षा के वक्त वह अकेली कैसे आई और वह भी गाड़ी में. उसके पास तो गाड़ी न थी. यद्यपि सवाल आये पर उनका जवाब उतना ज़रुरी न था जितना कि परीक्षा के सवालों का जवाब जानना. ‘छम्मक-छल्लों’ का झुण्ड भी आज नज़र ना आया. उसके बाद की परीक्षाओं में मेरी ना तो उसके साथ मुठभेड़ हुयी और ना किसी के साथ उसके बारे में बातें.
फिर हम सब अपनी जिंदगियों में व्यस्त हो गए. कॉलेज के साथ लेना देना ना था. सिर्फ इन्तजार था नतीजों का. लगभग ६ महीनों बाद टीवी के खबर पर पता चल गया कि नतीजे कब आ रहे हैं. कॉलेज पर फोन करके पता चला कि ‘मार्क्स शीट’ आ चुकी है और १० बजे जाना है उसे लेने. फिर सब के साथ मुलाकात होने वाली थी और शायद शेष बार के लिए.
निर्धारित दिन कॉलेज पहुँच गए. सबके चेहरों पर हंसी थी, औपचारिक ही सही. काफी लड़कियों को नौकरी मिल चुकी थी. जिन्हें नहीं मिली वो दूसरों से पूछ रहीं थी. ठीक १० बजे हमारी एच.ओ.डी. आ गईं और हम पंक्ति से खड़े हो गए. एक एक कर नाम पुकारा जाने लगा और हम अपने मार्क शीट लेने उनके कमरे में जाने लगे. अचानक एक साड़ी पहनी औरत को आते देखा. वो बिलकुल हमारे सामने आकार खड़ी हो गयी जबकि देर से आने की वजह से उसे पीछे खड़े होना चाहिए था. हमारी भौंहे तब ऊंची उठी जब देखा कि वो और कोई नहीं फातिमा थी और उसके पेट से अंदाजा लग रहा था कि कम से कम ७-८ महीने का गर्भ होगा. मन में चल रहे हज़ार सवालों के चलते सबके होश लगभग गुल थे. होश ठिकाने लगी फातिमा की ही चहक भरी आवाज से
“एक प्रेग्नेंट औरत तुम लोगों के सामने खड़ी है और तुम लोगों में इतनी तमीज नहीं कि उसे पंक्ति में लगने दो?”.
सबसे पहली खड़ी लड़की ने झट हटकर उसे अपनी जगह दे दी और वह खुशी खुशी उस जगह जाकर खड़ी हो गयी. अगले ही पल वो कमरे के अंदर थी और दो ही मिनट में अपना मार्क शीट लेकर कमरे के बाहर. फिर बिना किसी से कुछ कहे जिस तरह आई थी वैसे ही दरवाजे से बाहर चली गयी, जैसे एक तेज हवा का झोंका हो. लोंग यही सोचते रह गए कि ये हवा चली कहाँ से, तब तक हवा बह चुकी थी.
अब तो हम सबके भीतर फातिमा के प्रति बहुत सवाल थे जिनके जवाब जानने ज़रुरी लग रहे थे. मार्क शीट लेने के बाद हम सब विनोद कक्ष में एकत्रित हुए. किसी ने साहस कर फातिमा का प्रसंग छेड़ ही दिया. बस, फिर क्या था, चारों ओर से तथ्यों की बारिश शुरू हो गयी. मैं सबकी बातें सुनती रही और अंत में जिस नतीजे पर पहुंची वह ये है.
फातिमा जब पहली बार कक्षा में रोती दिखी थी, उसके काफी पहले से ही उसके और आतिफ की अनबन चल रही थी. इसके पीछे का कारण फातिमा के कहे अनुसार हमारे पाठ्यक्रम का दबाव था जिसके लिए वो आतिफ को वक्त नहीं दे पा रही थी. इसलिए धीरे धीरे आतिफ उससे दूर हटता जा रहा था, यहाँ तक कि किसी और लड़की के साथ रिश्ता जोर रहा था. पर काफी लड़कियां इस बात से सहमत नहीं थी. उनका मानना था कि बात कुछ और थी जो फातिमा छिपाना चाहती थी, इसलिए वैसा बेतुका बहाना बना दोष आतिफ के सिर मढना चाहती थी. पाठ्यक्रम के जोर तले हम सभी दबे थे. यहाँ तक कि हम में कुछ तो माँ तक थी, जो पति, बच्चे, घर संसार संभाल कर भी ये कोर्स कर रहीं थी. उसके लिए वक्त ना दे पाने का बहाना कच्चा था.
फातिमा का पति कौन है? इस सवाल का जवाब जब पता चला तब तो पक्का यकीन हो गया कि किसी और के साथ प्रेम सम्बन्ध आसिफ का चल रहा था या फातिमा का. फातिमा का पति दिव्या का देवर था. अब साफ़ हो गया कि फातिमा के साथ दिव्या की इतनी दोस्ती क्यों थी. फातिमा मुसलमान होते हुए भी सिंदूर, मंगलसूत्र पहन कर परीक्षा देने इसीलिए आई थी क्योंकि उसका पति हिंदू ब्राह्मिन था.
हमने सोचा कितने अच्छे खयालों वालें हैं फातिमा और दिव्या के घर वाले. पर सच्चाई कुछ और ही थी. बाकी परिवारों की तरह फातिमा के घरवाले भी उसके और आतिफ के रिश्ते के टूटने की खबर से नाखुश थे. सदमा उन्हें तब पहुंचा जब फातिमा ने हिंदू लड़के की बात छेडी. उसके अब्बाजान राजी न हुए. पर फातिमा को कुछ ज्यादा ही जल्दी मची थी. उसने सीधे जाकर अपने पिता के खिलाफ पुलिस में रपट लिखवा दी. बालिग़ लड़की के रपट लिखते ही, चाहे झूठ ही क्यों न हो, पुलिस घर आ धमकी और पिता को पकड़ ले गयी. दो रात पिता को थाने में ही रहना पड़ा. कितने शर्म की बात थी. न तो उसे मारा-पीटा गया था, न धमकी दी गयी थी. मामूली कहा सुनी की वजह से एक लड़की ने अपने पिता को थाने में डलवा दिया.
दूसरी ओर दिव्या के ससुराल में उसके ससुर जी का देहांत कई साल पहले ही हो चुका था. सास शांत स्वभाव की थी. उन्हें अपने बेटों की खुशी से मतलब था. इसलिए फातिमा के जात-पात से शायद उन्हें कुछ लेना देना न था. पर ये हमारी सोच है. क्योंकि आगे की घटना सुनने के बाद ये कहना आसान न था कि दिव्या के घरवालों ने भी आसानी से फातिमा को अपना लिया था.
पुलिस को जब फातिमा के अब्बू के खिलाफ कोई ठोस सबूत न मिला तो उन्हें उन्हें छोडना पडा. पर घर पहुँचते ही उन्हें एक और झटका लगा. फातिमा पिछली रात ही काफी पैसे और शादी के लिए बनवाये सब गहने लेकर घर से भाग चुकी थी. दिव्या के घरवालों को भी लगभग ऐसा ही सदमा पहुंचा जब उनके घर के बेटे ने भी ऐसा ही कदम उठाया. दोनों ने भाग कर शादी की. चूँकि लड़का नौकरी करता था, उन्होंने अलग घर किराये पर लिया और अलग रहने लगे. अगर लड़के के घर से सब राजी होते तो ऐसे कदम उठाने की नौबत ही नहीं आती.
अगला सवाल ये उठता है कि फातिमा को शादी कि इतनी जल्दी क्या मची थी कि परीक्षाओं के बीच ही इतना कुछ करना पड़ गया? तो बात कुछ हद तक साफ़ थी. अगर ६ महीने बाद नतीजे लेते वक्त उसका पेट इतना बढ़ा हुआ था, तो इसका मतलब परीक्षाएं शुरू होने से पहले ही वो प्रेग्नंट हो चुकी थी. आसिफ को शायद पता चल गया था कि फातिमा किसी और के बच्चे की माँ बनने वाली है और इसलिए उसने रिश्ता तोड़ दिया होगा. दूसरी तरफ ये भी हो सकता है कि बच्चा आसिफ का ही था. वो या तो उसे अपनाना नहीं चाहता था या फिर फातिमा तब तक दिव्या के देवर के साथ इश्क लड़ा चुकी थी. इसलिए जल्दी जल्दी घर से भाग कर शादी करनी पड़ी. अगर दूसरी बात सच्ची है तो उस हिंदू लड़के की दाद देनी चाहिए जिसने सब जान-बूझ कर फातिमा को अपना लिया. सच्चाई क्या है ये तो सिर्फ फातिमा ही जानती है.
अब वे लोग क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं वगैरह किसी को पता नहीं और शायद किसी में जानने की इच्छा भी बाकि नहीं रही.
ये कहानी अगर जात-पात से जुडी हुई होती तो शायद हम सब की सहानुभूति फातिमा के साथ होती. पर इन सारी बातों से फातिमा के प्रति किसी के भी दिल में कोई जगह नहीं बनती क्योंकि उसने अपने पिता के खिलाफ बिना किसी वजह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई और सलाखों के पीछे करवाया. शादी से पहले प्रेग्नंट हो गयी. घर से गहने पैसे चुराकर भागी और शादी भी कर ली. और इन सबके बाद किसी भी तरह की कोई शर्म-लिहाज न रखते हुए सब के साथ डपटकर बर्ताव करना उसे सबकी निगाहों में खोटा ही बना गया.
मैं नहीं जानती आपकी सोच मेरी सोच से मेल रखती है या नहीं, पर मुझे आज भी उसकी बात याद करते हुए एक अजीब सी उलझन महसूस होती है कि जो कुछ भी उसने किया, क्या वो सही था? खुद को उसकी जगह में रखकर भी सोचती हूँ पर पता नहीं क्यों, एक नकारात्मक भावना ही आती है उसके प्रति. सिर्फ एक डर लगता है कि कहीं मेरी बेटी कभी मेरे साथ या अपने साथ, ऐसा न करे.
bahut pyara aur jeevant chitran hai ... dil ko chhoo gayi... keep writing :)
ReplyDeleteघनानंद की कविता याद आती है- ''अति सूधो सनेह को मारग है/ जहां नेकु सयानप बांक नहीं ''.....प्रेम में किसी प्रकार की चालाकी नहीं चलती.....और जहां चालाकी होती है वहाँ प्रेम नहीं प्रेम-प्रपंच होता है...वहाँ प्रेम सहज नहीं होता,बल्कि उसे प्लान किया जाता है अपनी सुविधानुसार...
ReplyDeleteसुन्दर प्रयास है, निरंतर लिखें...मेरी शुभकामनाएं...