मैंने देखा है..
सड़क के कूड़ेदान के सामने
पागल भिखारी को
किसी के खाए आम के छिलके को
अमृत खाद्य सदृश ग्रास करते देखा है..
दृश्य को दूर खड़े छोटे से बच्चे ने देखा है...
एक दर्जन भावी पीढ़ी से घिरी
हाड़ के ढांचे को चीथड़े में लपेटी
माथे पे हाथ धरी, आंसू बहाती
अपने "मर्द" की राह देखती, "मादा" को देखा है..
दृश्य को दूर खड़े छोटे से बच्चे ने देखा है....
बूढी दादी को पोपले मुख से
झुकी हुए कमर को बिन बैसाखी के ढोते हुए
हर आते-जाते से दो रूपए की "पेन" खरीदने की विनती करते देखा है...
दृश्य को दूर खड़े छोटे से बच्चे ने देखा है....
भिखारी को कूड़ेदान से खदेड़ते हुए..
दर्जनों की जननी को आँख के इशारे पास बुलाने का इंगित करते हुए..
बूढी दादी को किनारे धकेलते हुए...
"suit" में तथाकथित "सुसभ्य" को काम में जाते देखा है...
दृश्य को दूर खड़े छोटे से बच्चे ने देखा है...
सच में..वह दूर खड़ा बच्चा..."मैं" हूँ...
वह मूक द्रष्टा ..."तुम" हो...
वह गवाह दर्शक..."हम" हैं...
बहतु बहुत स्वागत है सोनिया जी आपका ब्लॉग की दुनिया में....आगाज़ बहुत सुन्दर.....ब्लॉग का शीर्षक ज़बरदस्त....पथ दिखाने वाला....और सबसे महत्वपूर्ण आपकी देखने की कला...
ReplyDeleteमैंने देखा है
तुममे अनत संभावनाएं हैं
अकूत जिजीविषा
और एक अमल अनंत रौशनी
जो राह दिखाती है उन मुसाफिरों को
जो जीवन-पथ से भटक गए हैं...
आपकी रचनात्मक क्षमता निरंतर विकसित होती रहे,यही कामना है.......
विनोद जी, शुक्रिया मैं आपका अदा करती हूँ. आप ही की प्रेरणा से मैंने ब्लॉग की दुनिया में कदम रखा. दूसरों की दुनिया में आप इसी तरह 'रोशनी' फैलाते रहिये. ईश्वर आपकी हर इच्छा पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें. ब्लॉग को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव देते रहिएगा..मुझे उनकी सख्त ज़रूरत है..
ReplyDeleteसच में..वह दूर खड़ा बच्चा..."मैं" हूँ...
ReplyDeleteवह मूक द्रष्टा ..."तुम" हो...
वह गवाह दर्शक..."हम" हैं...
i loved these lines :)